Monday, November 21, 2005

भीष्म प्रतिज्ञा - 1

कपिलवस्तु ने प्रातःकाल स्नान करके अपनी दुशाला गले में ओढ़ी, और नदी के तट से वापस राजमहल की ओर बढ़े तो उन्हें अहसास हुआ कि सामने महल में बैठी रानी कनिका के उन्नत उरोज ठीक उनके चक्षुओं के सामने दृष्टिगोचर हैं। सहसा उन्हें आभास हुआ कि उनका लिङ्ग रक्त से भर के फूल गया है। तब उन्हें ध्यान आया कि ये उचित नहीं, आखिर उन्होंने राजा को वचन दिया था कि वे रानी के मान और उनकी सन्तति के अधिकारों की पूरी रक्षा करेंगे। उस समय उन्हें यह अनुमान न था कि कमसिन रानी चार वर्षों में यौवन की वाटिका में उच्छ्रिङ्खल क्रीडा करने वाली मोहक शोडषी बन जाएँगी, और रानी कनिका की कामुकता अलग अलग रूप में उनके सामने आ के उन्हें सताएगी। बाला की तरह खेल में मग्न रहने वाली इस बालिका का रजस्वला होने के उपरान्त अपने अङ्गों को और अपने सौन्दर्य को निहारना और निखारना स्वाभाविक ही था। प्रारम्भ में कनिका को आभास नहीं हुआ कि उसकी भङ्गिमाएँ कपिलवस्तु पर क्या असर डालती हैं लेकिन जब इसका भान हुआ तो तुरन्त ही वह भी अपनी स्थिति को समझ कर उनसे छेड़ छाड़ करती, लेकिन कपिलवस्तु को यह अहसास नहीं हुआ था कि रानी अब उतनी मासूम नहीं है जितनी प्रतीत होती है।

4 Comments:

Blogger prince said...

kabhi bhi aitihasik cheezon per kahaniyan na likhe .Ye hamari dharohar hai.

4:57 AM  
Blogger riddhibroadcast said...

kahani me wastavikta aur samay dk chitran karen to aur bhi swabhawik ho jayegi. logon ko wastvikta ke najdik lagegi.

11:32 AM  
Blogger bkth said...

ek kahani meri sono mai gov job karta hu mere ek karmchari ne muje ek aurat se milaya o aurat gajab ki thi oske ek ladka tha magar uski chuchi badi jandar thi o mujse boli aap meri madat kijeye meri ladki ki shadi hai mai

3:41 AM  
Anonymous Anonymous said...

Tum koibhi pratigya karo ma bap bahan bhai Friend kuch bhi likho par bhagavan ko isme na lo...Plz

11:09 AM  

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